आयुर्वेदावतरण – आयुर्वेद की उत्पति कैसे हुयी

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आयुर्वेद निर्मिति के बारे में  पुराणों में दो बाते बताई है|

१) देवी परंपरा-  देवता द्वारा निर्मिति 

      ब्रह्मदेव ने इस सृष्टि की निर्मिति की|सृष्टि की निर्मिति करने से पहले उन्होंने शाश्वत अनादि और  त्रिसूत्रमय इस तरह के आयुर्वेद शास्त्र की निर्मिति की इसका उल्लेख अष्टांग ह्रदय सूत्रस्थान में मिलता है| सृष्टि की निर्मिति के बाद उसमे निर्माण होनेवाले  लोगों की जिंदगी को स्वस्थ बनाने के लिए लोगों को बिमारियों से दूर रखने के लिए ब्रह्मदेव ने आयुर्वेद शास्त्र की निर्मिति की.उसके बाद ब्रह्मदेव ने दक्ष प्रजापति को आयुर्वेद का ज्ञान दिया दक्ष प्रजापति ने ये ज्ञान अश्विनीकुमार को दिया| फिर आगे जाकर अश्विनीकुमार ने ये ज्ञान देवों के राजा इंद्रदेव को दिया|जिस तरह से सृष्टि की निर्मिति ब्रह्मदेव से हुयी है उसी तरह सृष्टि में जो ज्ञान है उसी की निर्मिति भी ब्रह्मदेव से  ही हुयी है|इसलिए आयुर्वेद शास्त्र की परम्परा भी ब्रह्मदेव से ही शुरू हुयी है | ब्रह्मदेव ने एक लाख श्लोक की ब्रह्मसंहिता निर्माण की और उसमे आयुर्वेद का वर्णन किया|

२) लौकिक परंपरा – लोगों द्वारा निर्मिति 

       सतयुग कल में सृष्टि , वायु , देश , काल ,  धनधान्य औषधि जैसे गुणों की समृद्धि थी|मनुष्य के आचार विचार पवित्र थे ,  उनमे अहिंसा सच बोलना , इंद्रियों पर काबू रखना , चोरी न करना इस तरह के गुण थे |सभी लोग धार्मिक और सात्विक प्रवृत्ति के थे   इसलिए उनका स्वास्थ भी अच्छा  था| मनुष्य ओजस्वी और बलवान था|

जैसे जैसे सतयुग का अंत होने लगा वैसे वैसे मनुष्य का उत्साह कम होता गया|वो आलसी बनने लगा|मनुष्य जीने के लिए आवश्यक चीजों को प्राप्त करके अपने साथ रखने लगा जिसके कारण उनमे लोभ आसक्ति द्वेष क्रोध की उत्पति होने लगी |लोगों की प्रवृत्ति ख़राब हुयी जिसके  कारण सृष्टि में मौजूद वायु, देश , काल , जल, धनधान्य में मौजूद गुणों की क्षमता भी काम होने लगी|और कई तरह की बिमारीया उत्पन्न होने लगी.पृथ्वी पर मनुष्य का स्वास्थ ख़राब होने लगा और वो कई तरह की बिमारियों से पीड़ित हुआ | जिसके कारण उसका सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन बिखर गया|मनुष्य की हालत को देखकर सभी ऋषि हिमालय पर्वत पर इकट्ठा  हुए उसमे अंगिरा ,जमदग्नि , वसिष्ठ , कश्यप , आत्रेय , गौतम , नारद , अगस्त्य , वामदेव , परीक्षित , भरद्वाज , विश्वामित्रा जैसे कई सारे महान ऋषि मौजूद थे|

इन सभी ऋषि मुनियोंने चर्चा करके साबित किया धर्म  , अर्थ , काम , मोक्ष ये चार पुरुषार्थ ही आरोग्य है | मनुष्य की जिंदगी खतरे में है और वो एक अच्छे आरोग्य का हक़दार है.उस समय आरोग्य रक्षण का ज्ञान सिर्फ सिर्फ इंद्रदेव को ही पता था| इसलिए सभी ऋषियोने मिलकर ऋषितुल्य को आरोग्य का ज्ञान प्राप्त करने के लिए इंद्र देव के  पास भेज दिया.उसके बाद इंद्रदेव ने भरद्वाज को स्वस्थ और रोगी दोनों के लिए उपयुक्त त्रिसूत्रमय पुण्य और शाश्वत ऐसे आयुर्वेद का ज्ञान दिया|उसके बाद भरद्वाज ने ये आत्रेय सह अनेक ऋषिमुनी को ये ज्ञान बात दिया|जिसके कारन उसे और कई लोगों को स्वस्थ आरोग्य की प्राप्ति हुई|

आयुर्वेद उत्पति के बारे में हर ग्रंथ में अलग अलग बाते बताई है |

सुश्रुत संहिता के अनुसार काशिराज दिवोदास धन्वन्तरी ने इंद्रदेव से आयुर्वेद ग्रहण किया और अपने शिष्यों को सिखाया|कश्यप संहिता के अनुसार कश्यप  वसिष्ठ , अत्रि और भृगु इन ऋषियोने इंद्रदेव से आयुर्वेद ग्रहण किया और अपने शिष्यों को सिखाया इस तरह का वर्णन मिलता है|अष्टांग संग्रह के अनुसार आत्रेय को प्रमुख नेता बनाकर धन्वंतरि भरद्वाज ,  निमी , कश्यप इन सभी ऋषियोने इंद्रदेव से आयुर्वेद का ज्ञान ग्रहण किया|चरक संहिता के अनुसार दक्ष प्रजापति से अश्विनीकुमार ने ,अश्विनीकुमार से इंद्रदेव ने और इंद्रदेव से भरद्वाज ने आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया|फिर  भरद्वाज ने आयुर्वेद का ज्ञान आत्रेय पुनर्वसु को दिया|महाभारत और रामायण में धन्वंतरि और उनकी उत्पति का वर्णन किया hai|लेकिन वेदकालीन वाग्ङमय में या ब्राह्मण पुराण में कही पर भी इसका उल्लेख नहीं है|

रामायण के अनुसार अमृत प्राप्ति के लिए देव और दानवो ने  क्षीरसागर का मंथन किया| समुद्र मंथन के बाद १४ रत्न प्राप्त हुए |उसी  में से एक श्री धन्वंतरि है जो अमृत का कलश लेकर बाहर आये|इन १४ रत्नों में श्री लक्ष्मी देवता ,कौस्तुभ नामक सोना देनेवाला मणी  कल्पतरू या पारिजात का वृक्ष , उत्तम दर्जे का मद्य धन्वंतरि , अमृत , चंद्र कामधेनु गाय , एरावत नाम का हाथी , रंभा जैसी देवांगना , सप्तप्रमुखी अश्व ,जहर , शंख  और औषधी वनस्पतियों का समावेश है|

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