नागरमोथा की पहचान

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नागरमोथा वैज्ञानिक(scientific) नाम Cyperus scariosus है। नागरमोथा मोथा जाति की वनस्पति है। यह आपको कई प्रकार में मिल जाएगी। इसमें मोथा,केप्टिव मोथा और नागरमोथा जैसी इस मोथा की प्रजातियां होती हैं। नागरमोथा की पहचान कैसे करते यह भी हम जानेंगे |

नागरमोथा एक महत्वपूर्ण औषधि है, जिसका उपयोग आयुर्वेद चिकित्सा में कई सालों से हो रहा है। यह एक पौधा है जो पूरे भारत में खरपतवार के रूप में उगता है। इससे इत्र बनता है और औषधि के रूप में इसका उपयोग होता है। संस्कृत में इसे नागरमुस्तक या भद्र मुस्तक कहते हैं। यह नमी वाले तथा जलीय क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है।

नागरमोथा पूरे भारत में नमी तथा जलीय क्षेत्रों में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। नागरमोथा दीपन (पाचन शक्ति को बढ़ाने वाला), पाचक (भोजन को पचाने वाला), कफ, पित्त, रक्त-विकार (खून की बीमारी), तृषा (प्यास), ज्वर और कीड़ों को नाश करता है।

यह चर्मरोग नाशक, ज्वरध्न, विषध्न, बल्य, गर्भाशय संकोचक, स्तन्यशोधन और मूत्रल है। नागरमोथा में प्रोटीन स्टार्च और कार्बोहाइड्रेट पाए जाते हैं। नागरमोथा को पीसकर स्त्री के स्तनों पर लेप करने से प्रसूता के स्तनों की कठोरता और गाठ ठीक हो जाती है।

घावों पर नागरमोथा के चूर्ण को लगाने से घाव फैलते नहीं। नागरमोथा की ताज़ी जड़ को घिसकर गाय का घी मिलाकर घाव पर लेप करने से घाव ठीक हो जाता है।

आयुर्वेद के अनुसार, अधिक प्यास लगने की समस्या, बुखार और पेट में कीड़े होने पर नागरमोथा से लाभ मिलता है।

5 ग्राम नागरमोथा चूर्ण को दूध के साथ मिलाकर प्रसूता को पिलाने से स्तनों में दूध की वृद्धि होती है। घावों पर नागरमोथा के चूर्ण को लगाने से घाव फैलते नहीं। नागरमोथा की ताज़ी जड़ को घिसकर गाय का घी मिलाकर घाव पर लेप करने से घाव ठीक हो जाता है।

नागरमोथा और गोखरू के चूर्ण को एक साथ मिलाकर सेवन करने से गठिया के रोग में लाभ है। नागरमोथा में मूत्रल गुण मौजूद होते है। इसके चूर्ण का सेवन छाछ के साथ करने से मूत्र में वृद्धि होती है।

घावों पर नागरमोथा के चूर्ण को लगाने से घाव फैलते नहीं। नागरमोथा की ताज़ी जड़ को घिसकर गाय का घी मिलाकर घाव पर लेप करने से घाव ठीक हो जाता है।

नागरमोथा और गिलोय को समान मात्रा में मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से बुखार ठीक हो जाता है।

सुजन वाली जगह पर नागरमोथा को पीसकर लगाने से सूजन जल्द ही खत्म हो जाती है। नागर मोथा को पीसकर घाव पर लगाने से घाव जल्दी ही ठीक होता है lअगर कहीं पर दर्द है तो नागरमोथा, चंदन और मुलहठी को पीसकर लेप लगाने से दर्द से मुक्ति मिलती है।

एक एक चम्मच नागरमोथा और बेल का चूर्ण पानी के साथ सेवन करने से अतिसार रुक जाता है। कुछ दिनों तक 1 ग्राम नागरमोथा का चूर्ण एक गिलास पानी के साथ पीने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।

नागरमोथा,अतीस, कर्कटशृंगि और पिप्पली को समान मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को शहद के साथ लेने से खांसी में आराम मिलता है।
नागर मोथा के फल को पीसकर कपड़े से निचोड़कर इसका रस निकाल लें। इस रस को लगाने से योनि की जलन और खुजली दूर हो जाती है।

1 ग्राम नागरमोथा का चूर्ण और शहद के साथ लेने से हिचकी मिट जाती है। नागरमोथा का काढ़ा बनाकर पीने से गर्मी में आराम मिलता है। नागर मोथा की जड़ का काढ़ा बनाकर पीने से भूख बढ़ती है। यह आपके दिल को भी स्वस्थ रखता है। स्मरण शक्ति को बढ़ाने के लिए नागरमोथा बहुत ही लाभकारी है।

10 ग्राम नागरमोथा और पित्तपापड़ा दोनों को एक साथ मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढे़ को भोजन से 1 घंटे से पहले पीने से बुखार दूर होता है और भूख बढ़ती है।

नागरमोथा की जड़ और फल का काढ़ा बनाकर सेवन करने से पसीना और पेशाब खुलकर आता है और मुंह से लार का गिरना रुक जाता है। सफेद मोथा के फूल को काली रंग की गाय के दूध में पीसकर स्तनों पर लेप करने से स्तनों के साइज (आकार) में वृद्वि होती है।

नागरमोथा, धाय के फूल, लोध्र, बेलगिरी, मंजीठ और नेत्रवाला को मिलाकर काढ़ा बनाकर पिलाने से अथवा इन सबको पीसकर इसके चूर्ण को शहद में मिलाकर चटनी की तरह चटाने से बच्चों का अतिसार पूरी तरह से दूर हो जाता है।

मलेरिया और टाइफाइड की बीमारी में बुखार को कम करने के लिए भी नागरमोथा को प्रभावी औषधि माना जाता है। टाइफाइड बुखार को कम करने के लिए के लिए नागरमोथा राइजोम, फुमारिया इंडिका (पितपापड़ा), र्स्वेतिया चिरायता, काली मिर्च और अदरक से बने काढ़े को प्रयोग में लाने की सलाह दी जाती है।

नागरमोथा को पीसकर अण्डकोषों पर लेप करने से अण्डकोषों की खुजली में लाभ होता है।

प्लीहा रोग में नागरमोथा, वायबिंडग दोनों को 75-75 ग्राम लेकर चूर्ण बना ले, इसमें दुगनी मात्रा में मंडूर मिलाकर दस गुने गोमूत्र में पकाएं और जब रस गाढ़ा हो जाए तो 2 चम्मच की मात्रा में मटठे के साथ सुबह-शाम नित्य सेवन करने से प्लीहा रोग में लाभ होता है।

सिरदर्द में नागरमोथा, मुलेठी, कैथ की पत्ती, लाल चंदन को समान भाग लेकर पीस कर लेप लगाने से सिरदर्द शांत हो जाती है।

रक्तपित्त में नागरमोथा, सिंघाड़ा, धान का लावा, खजूर, कमल, केशर को समान भाग लेकर 4 ग्राम चूर्ण की मात्रा को शहद के साथ रक्त पित्त के रोगी को दिन में दो तीन बार चटाने से रक्तपित्त रोग में लाभ होता हैं। नागरमोथा में क्लोरोजेनिक एसिड पाया जाता है जो इसे एंटी इंफ्लामेटरी गुण प्रदान करता है। ऐसे में यह डर्मटाइटिस यानी त्वचा की सूजन की गंभीर और लंबे समय से चली आ रही समस्याओं को ठीक कर सकता है।

नागरमोथा को कब्ज के इलाज में भी असरदार माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार जिन लोगों को कब्ज की समस्या होती है उन्हें दिन में तीन बार 25 मिलीलीटर की मात्रा में नागरमोथा राइजोम के जूस का सेवन करने से लाभ मिलता है।

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1 Comment
  1. Ramlal Bhagora says

    Joint pain ka elaj

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